कलकत्ता हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: पश्चिम बंगाल के सभी नए ओबीसी प्रमाणपत्र रद्द - statementtodaynews.com

कलकत्ता हाई कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: पश्चिम बंगाल के सभी नए ओबीसी प्रमाणपत्र रद्द

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अब्दुल बासिद खान / ब्यूरो मुख्यालय : 

कोलकाता: कलकत्ता हाई कोर्ट ने पश्चिम बंगाल की आरक्षण व्यवस्था को लेकर बुधवार को एक बड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत की एक खंडपीठ ने राज्य में ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली पिछली तृणमूल कांग्रेस (TMC) सरकार के दौरान नई व्यवस्था के तहत जारी किए गए सभी अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) प्रमाणपत्रों को तत्काल प्रभाव से रद्द कर दिया है।

न्यायमूर्ति राजशेखर मंथा और न्यायमूर्ति अनुज सिंह की खंडपीठ ने अपने अहम आदेश में स्पष्ट किया है कि अब राज्य में ‘ओबीसी-ए’ और ‘ओबीसी-बी’ नाम की दो अलग-अलग श्रेणियां अस्तित्व में नहीं रहेंगी।

हाई कोर्ट के फैसले की मुख्य बातें:

  • सामान्य श्रेणी में आएंगे लोग: अदालत ने साफ कहा है कि जिन लोगों को इन दोनों श्रेणियों (ओबीसी-ए और बी) के तहत प्रमाणपत्र जारी किए गए थे, वे अब मान्य नहीं होंगे। ऐसे सभी प्रमाणपत्र धारकों को अब सामान्य श्रेणी (जनरल कैटेगरी) में ही माना जाएगा।
  • दोहरी व्यवस्था का अंत: साल 2010 के बाद से पश्चिम बंगाल में ओबीसी समुदाय को दो वर्गों (ओबीसी-ए और ओबीसी-बी) में बांटने की जो व्यवस्था लागू की गई थी, उसे कोर्ट ने समाप्त कर दिया है।

भ्रष्टाचार के आरोप और विवाद की जड़ पिछली सरकार के कार्यकाल में जारी किए गए इन ओबीसी प्रमाणपत्रों को लेकर लंबे समय से विवाद चल रहा था। इन प्रमाणपत्रों को थोक में जारी करने की प्रक्रिया पर भ्रष्टाचार और भाई-भतीजावाद के गंभीर आरोप लगे थे।

कानूनी लड़ाई का घटनाक्रम:

  • 2024 का आदेश: कलकत्ता हाई कोर्ट ने पहले इस मामले की सुनवाई करते हुए 66 समुदायों को ओबीसी सूची से बाहर कर दिया था और उनके प्रमाणपत्र रद्द कर दिए थे। साथ ही, नए सिरे से सर्वेक्षण (सर्वे) कराने का आदेश दिया था।
  • सुप्रीम कोर्ट में हार: तत्कालीन ममता सरकार इस फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट गई, लेकिन शीर्ष अदालत ने हाई कोर्ट के आदेश को ही बरकरार रखा।
  • सर्वेक्षण पर उठे सवाल: सुप्रीम कोर्ट के निर्देश के बाद राज्य सरकार ने नया सर्वे कराया और 142 समुदायों को ओबीसी सूची में शामिल कर लिया। लेकिन आरोप लगा कि करोड़ों की आबादी वाले राज्य में यह सर्वे केवल 2,500 नमूनों (सैंपल्स) के आधार पर जल्दबाजी में कर लिया गया।
  • कोई ‘स्टे’ नहीं: हाई कोर्ट ने इस खानापूर्ति वाले सर्वे पर कड़ी आपत्ति जताई। राज्य सरकार फिर सुप्रीम कोर्ट दौड़ी, लेकिन वहां से उसे कोई स्थगन आदेश (स्टे) नहीं मिला।

सुप्रीम कोर्ट से राहत न मिलने और नए सिरे से जारी किए गए प्रमाणपत्रों की प्रक्रिया में खामियां पाए जाने के बाद, अब बदली हुई परिस्थितियों में कलकत्ता हाई कोर्ट ने इस नई व्यवस्था के तहत बने सभी ओबीसी प्रमाणपत्रों को पूरी तरह से रद्द कर दिया है। इस फैसले का असर राज्य की शिक्षा और रोजगार व्यवस्था पर व्यापक रूप से पड़ेगा।

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